Pehla Parkash Shri Guru Granth Sahib ji
Pehla Parkash Shri Guru Granth Sahib ji


परिचय : श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी सिखों के ११वें गुरु हैं। सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने अंतिम समय में सिखों के धार्मिक ग्रन्थ श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी को गुरगदी सौंप कर आदेश दिया के अब से श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी ही सिखों के गुरु हैं और आदेश दिया के कोई भी सिख किसी और को सीस नहीं झुकायेगा, हर सिख सिर्फ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को ही सीस झुकाएगा।  


इतिहास : एक दिन जब सिखों के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी अपने सिखों से बात कर रहे थे और बानी सुना रहे थे तो एक सिख ने कहा कि गुरु जी जैसे आप बानी सुनाते हैं वैसे ही और लोग भी बानी लिख रहे हैं तो हमें कैसे पता चलेगा कि असली/सच्ची बानी (गुरुओं की बानी) कोनसी है और नकली बानी कोनसी है?  

प्यारे गुरु जी कृपा करें तांकि सच्ची बानी को संभाल कर रखा जा सके। 


यह बात सुन कर एक और सिख ने वैसा ही सवाल किया। 


तब गुरु जी ने कहा गुरुओं की बानी उत्तम है, गुरुओं की बानी पड़ना, सुनना और समझना ज़रूरी  है, 


कुछ समय बाद गुरु अर्जुन देव जी ने सिखों को आदेश दिया के पहले चार गुरुओं की बानी इकठ्ठी की जाये, गुरु जी ने कहा कि सिखों के तीसरे गुरु श्री गुरु अमरदास जी गोइंदवाल साहिब में रहते थे अब वहां पर गुरु जी के बड़े बेटे बाबा मोहन जी रहते हैं उनके पास पहले चार गुरुओं की बानी है। 


गुरु जी ने अपने सिखों को बाबा मोहन जी के पास से वो पोथियाँ ले आने को कहा। गुरु जी का आदेश मान कर सिख बाबा मोहन जी के पास से पोथियाँ लेने गए पर असफल रहे। 


उसके बाद गुरु जी खुद नंगे पांव अमृतसर से गोइंदवाल साहिब (लगभग ४० किलोमीटर ) पैदल गए और बाहर बैठ कर कीरतन करने लगे। 


कीरतन सुन कर बाबा मोहन दास जी की समाधि खुल गई और वो गुरु जी मिलने आए फिर गुरु जी की बेनती स्वीकार कर के बाबा मोहन जी ने गुरु जी को पोथियाँ सौंप दी। 


गुरु जी ने पोथियों को सतिकार सहित पालकी में बिराजमान किया और खुद नंगे पाँव गोइंदवाल साहिब से अमृतसर तक पैदल आए। 


अमृतसर में अठसठ तीरथ में (जो हरमंदिर साहिब के सरोवर के पास मौजूद है) 


यहाँ पर गुरु अर्जुन देव जी ने सभी पोथियों में लिखी हुई बानी को एक साथ इकत्तर करना शुरू कर दिया और एक अलग ग्रंथ लिखना शुरू कर दिया। 


श्री गुरु अर्जुन देव जी ने श्री गुरु नानक देव जी, श्री गुरु अंगद देव जी, श्री गुरु अमरदास जी, श्री गुरु रामदास जी की बानी के साथ १५ भगतों, १७ भट्ट और ४ गुरसिखों की बानी दर्ज़ की। 


(नोट : श्री गुरु ग्रंथ साहिब में सिखों के ६ गुरुओं की बानी दर्ज़ है - पहले पांच और नौवें गुरु की बानी दर्ज़ है)


जब यह ग्रन्थ सम्पूर्ण हुआ तो १६०४ ई: में इसका पहला प्रकाश किया गया। 


(नोट : इसे पहला प्रकाश इसलिए कहा जाता है क्यूंकि बाद में सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने नौवें गुरु जी की बानी दर्ज करके फिर से इसका प्रकाश किया था )